गुरुवार, 3 जून 2010

डागी डब्बू !!

एक डागी था , उसका नाम था डब्बू ।

वह ना अपने घर जा रहा था , तो उसनें पता है क्या देखा ?

क्या देखा ?

डागी नें एक बनाना देखा । पता है बनाना कहां पडा था ?

कहां पडा था ?

गली में

, और उसके ऊपर तो मोटो( मच्छर ) भी बैठे थे और डागी नें वो बनाना खा लिया ।

फ़िर पता है डागी के पेट में कीडे आ गए ।

क्यों डागी के पेट में कीडे क्यों आ गए ?

उसनें गंदा बनाना खाया था न ।

छी -छी कितनी गंदी बात की न डागी नें ।गंदी चिज्जी खाना गंदी बात होती है न ?
हां , गंदी चिज्जी खाना तो बहुत ही गंदी बात होती है । तुम कभी गंदी चिज्जी नहीं खाना ।

मैं तो अच्छा बच्चा हूं न गंदी चिज्जी कभी नहीं खाता । आप भी मत खाना ।

ओ .के. मैं भी कभी गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगी । फ़िर डागी नें क्या किया ?

फ़िर डागी नें मैडिसन ली ।

कौन सी मैडिसन ली ?

जो आप नहीं मुझे देते हो कभी -कभी वार्म्स वाली मैडिसन ।

हां.....

वही मैडिसन डागी नें भी ली

, तो सारे कीडे भाग गए ।

फ़िर डागी की मम्मी नें उसको जोर से डांटा ।

कैसे ?

आगे से गंदी चिज्जी खाओगे

, सेअ सारी मैं आगे से गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगा ।

तो डागी नोई-नोई करने लगा , सारी मम्मी प्लीज़ फ़ारगिव मीं , मैं आगे से गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगा ।

और वो अच्छा बच्चा बन गया ।


मेरी यह कहानी ब्लागोत्सव-2010 में भी प्रकाशित हुई

8 टिप्‍पणियां:

PD ने कहा…

हा हा हा.. बहुत प्यारी कहानी.. :)

दिलीप ने कहा…

ha ha ha badhiya

उन्मुक्त ने कहा…

शुभम आपसे और आपके डॉगी से मिल कर अच्छा लगा।

माधव ने कहा…

हा हा हा.. बहुत प्यारी कहानी
good massage as well

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

शुभम् जी,
बिजली की कटौती से डरकर
आज की चर्चा मैंने गुरुवार को ही शेड्यूल कर दी थी!
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अगर आपकी संगीता ताई मदद न करतीं,
तो इससे पहलेवाली चर्चा तो हो ही नहीं पाती!
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आपका प्यारा डॉगी मैंने बाद में देखा!
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इसको अगली चर्चा में अवश्य शामिल किया जाएगा!
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यह बहुत अच्छी शिक्षाप्रद कहानी है!

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

आपका डागी तो बहुत प्यारा है..सुन्दर सन्देश देती कहानी..बधाई.
______________
पाखी की दुनिया में 'पेड़ कहीं कटने ना पायें'

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत प्यारी कहानी कही है...गन्दी चीज़ें बिलकुल नहीं खानी चाहिए ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

शुभम जी!
आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा मैंने यहाँ भी की है!
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http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/06/1.html

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