सोमवार, 20 दिसंबर 2010

चित्रकला प्रदर्शनी

नमस्कार दोसतो ,




आज लगभग दो माह बाद मैं फ़िर से आया हूं आपके लिए लेकर एक नन्ही सी कविता । कल जब हम स्कूल जा रहे थे तो रास्ते में बारिश होने लगी तो मैनें मम्मी को एक कविता सुना दी , आप भी पढिए । हां मुझसे चिमटा-चिमटा का मतलब मत पूछिएगा , वो तो मुझे क्या मम्मी को भी नहीं पता । आपको पता हो तो मुझे जरूर बताईएगा ।

चिमटा-चिमटा बारिश होती

मोटर गाडी चलती जाती

मम्मी तो छाता ले लेती

मुझको रेन कोट पहनाती

चिमटा-चिमटा बारिश होती



हमारे स्कूल में चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । मम्मी के साथ मैनें भी कुछ चित्र / माडल बनाए । नन्हें-मुन्ने बच्चों की प्यारी-प्यारी कला-क्रितियां देखकर हमें बहुत मजा आया । आप भी देखिए उसकी कुछ झलकियां ।



                                     

आपका
शुभम सचदेव

शनिवार, 18 सितंबर 2010

हर दिन हीरो बनता जाता



पिऊं दूध और खाऊं मलाई 
अच्छी लगती मुझे मिठाई 
थोडा-थोडा बढता जाता 
हर दिन हीरो बनता जाता 

शनिवार, 11 सितंबर 2010

गणेश जी की दुनिया

नमस्कार दोसतो ,
आज गणेश चतुर्थी है न तो मुझे मम्मी नें गणेश जी की एक बहुत अच्छी कहानी सुनाई । मैं आपको भी सुनाऊं ----

गणेश जी की दुनिया 

एक बार गणेश जी अपने बडे भाई कार्तिकेय के साथ खेली-खेली कर रहे थे , तो दोनों भाई फ़ाईट करने लगे ।
फ़ाईट.....पर क्यों ?
क्योंकि गणेश जी के बडे भाई कह्ते थे मैं स्ट्रांग ब्वाय हूं और गणेश जी कहते मैं हूं ।
फ़िर ....
फ़िर दोनों नें एक फ़ैसला किया ।
कैसा फ़ैसला ?
यही कि जो पूरी दुनिया घूम कर सबसे पहले वापिस आएगा , वही स्ट्रांग होगा ।
तो क्या हुआ ?
 तो कार्तिकेय जी तो तेज-तेज भागी-भागी करने लगे और गणेश जी तो भागे ही नहीं ।
फ़िर तो गणेश जी हार गए होंगे ?
नहीं , गणॆश जी नें पता है क्या किया ?
क्या किया ?
उन्होंनें अपने मम्मी-पापा के गिर्द एक चक्कर लगाया और मम्मी की गोदि में बैठकर लड्डु खाने लगे ।
तो कार्तिकेय का क्या हुआ ?
वो तो भागी-भागी करते-करते थक गया और जब वापिस आया तो गणेश जी को मम्मी की गोदि में आराम से बैठा देखकर बोला-
अरे , तुम तो लेज़ी ब्वाय हो , देखो मैं पूरी दुनिया घूम कर आ गया और तुम वहीं बैठे हो , इसलिए मैं स्ट्रांग ब्वाय हूं ।"
तो गणेश जी नें पता है क्या कहा ---
क्या कहा...?
मैं स्ट्रांग ब्वाय हूं , क्योंकि मैं तुमसे पहले ही चक्कर लगा आया हूं ।
पर कैसे ?
मैनें मम्मी पापा के गिर्द घूम लिया और वही मेरी पूरी दुनिया हैं । मम्मी-पापा से बढकर तो कुछ भी नहीं ।"
फ़िर .....?
फ़िर गणेश जी की बात सुनकर कार्तिकेय नें अपनी हार मान ली ।

हैपी गणेशोत्सव टू आल आफ़ यू ।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

नटखट कान्हा की मुलरी ( मुरली )

आपको कान्हा की पहले मैंने दो कहानियां सुनाई न और आप सबको अच्छी भी लगीं | मैं आप सब का आभारी हूँ कि आपको मेरी कहानियां पसंद आ रही हैं | अब कान्हा की एक और कहानी सुनाऊँ | 
एक बार कान्हा घर में अपनी मम्मी के पास खेली-खेली कर रहा था तो उसनें बाहर से आवाज सूनी |
कैसी आवाज़ ....?
वो बाहर मुलरी ( मुरली , मुझे मुरली बोलना नहीं आता तो मैं मुरली को मुलरी बोलता हूँ ) बेचने वाले अंकल आए थे न |
मुलरी बेचने वाले अंकल......?
हाँ जैसे यहाँ नहीं आते हैं कभी-कभी और  आप मुझे लेकर देते हो ?
हाँ .....| 
वैसे ही .....| 
फिर ......|
फिर कान्हा नें अपनी मम्मी को बोला -मुझे भी मुलरी चाहिए |
तो मम्मी नें पता है क्या कहा ....?
क्या कहा ...?
मम्मी नें कहा - तुम आगे से कोइ शैतानी नहीं करोगे तो मैं तुम्हें मुरली लेकर दूंगी |
कौन सी शैतानी ?
तुम किसी का माखन नहीं चुराओगे 

प्रोमिस मम्मी मैं आगे से कोइ शैतानी नहीं करूंगा | कान्हा नें कान पकड़ कर मम्मी को सॉरी बोला |
तो  फिर.........
तो फिर मम्मी हँसने लगी और कान्हा को एक मुलरी लेकर दी | कान्हा मुलरी लेकर बहुत हैपी - हैपी हुआ और वो मुलरी बजाने लगा |
फिर क्या हुआ ......?
फिर .....कल बताऊंगा कि क्या हुआ ? 

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

क्रोअ और बंटी


एक क्रो (कौआ ) था , वह दूर तक फ़्लाई कर रहा था । फ़्लाई करते-करते उसे बहुत भूख भी लगी और प्यास भी लग रही थी । पर वह क्या करता ?
फ़िर उसनें पता है क्या देखा ?
क्या देखा...?
उसनें बंटी को देखा ।
कौन बंटी ..?
बंटी जो छत पर पतंग उडा रहा था । और पतंग उडाते-उडाते उसकी पतंग कट गई और ऊपर फ़्लाई करने लगी ।
फ़िर...........
फ़िर बंटी रोने लगा । क्रोअ बंटी को देख रहा था , वह बंटी के पास आया और बोला....
तुम क्यों रो रहे हो.....?
मेरी पतंग कट गई , अब मैं कैसे खेलुंगा , बंटी नें रोते-रोते कहा ।
प्लीज़ तुम रोओ मत , मैं तुम्हारी हेल्प करुंगा , पर तुम्हें भी मेरी हेल्प करनी होगी ( क्रोअ नें बंटी से कहा )
मैं तुम्हारी कैसे हेल्प कर सकता हूं (बंटी नें पूछा )
मुझे बहुत भूख लगी है और प्यास भी , अगर तुम मुझे पानी पिला दो और कुछ खाने को दे दो तो मैं तुम्हारी पतंग वापिस ले आऊंगा ।
क्रोअ की बात सुनकर बंटी खुश हो गया .....
ठीक है मैं तुम्हारे लिए खाना और पानी लाता हूं , तब तक तुम मेरी पतंग ले आओ ।
सुनकर क्रोअ कांव कांव करता ऊपर फ़्लाई कर गया और पतंग अपनी चोंच में पकड कर ले आया ।
बंटी भी क्रोअ के लिए पता है क्या लेकर आया ?
क्या लाया....?
मैंगो जूस और चिप्स ।
अरे वाह , फ़िर तो क्रोअ को बहुत मजा आया होगा न ।
हां क्रोअ को भी बहुत मजा आया और बंटी भी अपनी पतंग वापिस पाकर खुश हो गया ।वो दोनों फ़्रैण्ड बन गए ।
हमें भी अपने फ़्रैण्डस की हेल्प  करनी चाहिए न ।
हां , हमें हमेशा अपने फ़्रैण्डस की हेल्प करनी चाहिए ।

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बुधवार, 21 जुलाई 2010

छिपकली और चूहे



एक न छिपकली थी , उसके बहुत सारे फ़्रैण्डस थे ।
पता है उसके फ़्रैण्ड्स कौन थे ?
कौन थे ...?
चूहे...... 
चूहे छिपकली के फ़्रैण्डस थे ...?
हां , और वो सब मिलकर रहते थे । उनके घर के पास न एक स्नेक भी रहता था ।
उन्हें डर नहीं लगता था स्नेक से ।
लगता था , स्नेक हर रोज चूहों को मारता था । वो जब भी स्नेक को देखते घर से  भाग जाते , पर स्नेक उनके बच्चों को पकड के खा जाता । 
चूहे बहुत दुखी रहते थे , पर क्या करते ?
उनकी जो फ़्रैण्ड थी न छिपकली 
हां ....
एक दिन उसे बहुत गुस्सा आया । और जब स्नेक उनके घर में आया न तो वह जानबूझ कर स्नेक के सामने आ गई और स्नेक नें उसे चूहा समझ कर पकड लिया और खाने लगा । जैसे ही उसे मुंह के पास ले गया छिपकली नें जोर से स्नेक की आंख में मारा । अब तो वह देख भी नहीं सकता था और इधर उधर घूमने लगा । सारे चूहे और छिपकली उसे कभी इधर से छेड्ते और कभी उधर से छेडते , पर वो किसी को भी पकड नहीं सकता था ।
फ़िर क्या हुआ ?
फ़िर स्नेक रोने लगा और उसनें चूहों से माफ़ी भी मांगी और चूहों नें उसको जाने दिया । 

सोमवार, 12 जुलाई 2010

क्लाऊड्स की टक्कर और वर्षा

एक बार मम्मी किचन में खाना बना रही थी और पता है क्या हुआ ?
क्या हुआ ......?
मम्मी नें प्रेशर कुक्कर खोला तो उसमें से क्लाऊडस निकलने लगे ।
फ़िर...........?
फ़िर पता है वो क्लाऊड्स ऊपर फ़्लाई कर गए । फ़्लाई करते-करते वो बहुत ऊपर चले गए ।
फ़िर क्या हुआ.......?
फ़िर ऊपर एक और क्लाऊड फ़्लाई कर रहा था और दोनों की जोर से टक्कर हो गई ।
क्यों दोनों की टक्कर कैसे हुई ?
जैसे दो गाडियों की नहीं हो जाती कई बार , जब आमने-सामने आ जाती हैं तो ।
हां......
वैसे ही दोनों क्लाऊड्स आमने-सामने आ गए और दोनों की टक्कर हो गई ।
फ़िर..........?
फ़िर दोनों को चोट लग गई और नोई-नोई (रोने ) करने लगे ।
फ़िर...........?
फ़िर रेन (वर्षा ) हो गई ।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

नट्खट कान्हा - 2

 हैलो फ़्रैण्ड्स


मैने पहले आपको कान्हा की एक कहानी सुनाई न । आज कनुआ की एक और कहानी सुनाऊंगा ।



२. नॊटी ब्वाय

कनुआ बहुत ही नाटी ब्वाय था । वह अपनी मम्मी को बहुत परेशान करता था । मम्मी बोलती खाना खा लो तो वह नहीं खाता , न्हाई-न्हाई करलो , तो भी नहीं करता था ।

फ़िर क्या करता था ?

वो बाहर हागी-भागी कर जाता था ।

तो फ़िर...............?

फ़िर वो बच्चों के साथ खेली-खेली करता था और जब भूख लगती तो अपने सारे फ़्रैण्ड्स के साथ चोरी से किसी के घर में घुस जाता ।

हां , तो फ़िर क्या करता ?

फ़िर वो चुपके से उनका दुधु पी जाता , कर्ड खा जाता , बटर खा जाता और नीचे भी गिरा देता था ।

किसी की चिज्जी खाना तो गन्दी बात होती है न ?

हां किसी की चिज्जी कभी नहीं खानी चाहिए , और नीचे भी नहीं गिरानी चाहिए ।

फ़िर कनुआ क्यों गिराता था ?

वो नाटी ब्वाय था न , इसीलिए ।

फ़िर पता है उसकी मम्मी को लोगों नें बताया ।

क्या बताया ?

यही कि कनुआ चोरी से माखन खाता है , दुधु पीता है , दही खाता है और सारा नीचे भी गिरा देता है ।

फ़िर उसकी मम्मी ने क्या किया ?

उसकी मम्मी ने उसको डार्क रूम में बंद कर दिया , उसको कुछ भी नहीं दिख सकता था और वो डरने लगा , नोई-नोई (रोना ) भी करने लगा ।

तो फ़िर उसकी मम्मी नें उसको बाहर नहीं निकाला ?

नहीं जब कनुआ नें मम्मी को सोरी बोला तो मम्मी नें उसको बाहर निकाल दिया और वो फ़िर से खेली खेली करने लगा ।

शनिवार, 26 जून 2010

नट्खट कान्हा

नट्खट कान्हा


मुझे मम्मी नें नटखट कान्हा की बहुत अच्छी-अच्छी कहानियां सुनाईं , मुझे सुनकर बहुत मजा आया । आपको भी सुना रहा हूं ।



१. एक न बहुत नटखट बेबी था , उसका नाम था कान्हा । उसकी मम्मी उसे प्यार से कहती थी कनुआ ।

उसकी मम्मी उसे कनुआ क्यों कहती थी ?

जैसे मैं आपको प्यार से कनु कहती हूं , वैसे कान्हा की मम्मी भी उसे प्यार से कनुआ कहती थी ।

कनुआ बहुत शरारती ब्वाय था ।

वो क्या करता था ?

वो ऐसे ही शरारतें करता रहता था । एक बार पता है क्या हुआ ?

क्या हुआ ....?

कनुआ नें मिट्टी खा ली ।

मिट्टी तो गंदी चिज्जी होती है न ।

हां , पर कनुआ नें तो खा ली और उसकी मम्मी नें देख लिया ।

फ़िर उसकी मम्मी नें उसे डांटा ....?

नहीं , उसकी मम्मी नें उसे एक ट्री के साथ बांध दिया ।

उसको रस्सी से बांध दिया था....?

हां उसके हाथ रस्सी से बांध दिए थे । और फ़िर पता है क्या हुआ ?

क्या हुआ ....?

कनुआ को पीठ पे खुजली होने लगी ।

फ़िर उसनें क्या किया ? उसके हाथ तो रस्सी से बंधे हुए थे ।

वो अपनी पीठ को ट्री के साथ खुजाने लगा , तो ट्री टूट गया ।

ट्री क्यों टूट गया ?

क्योंकि कनुआ स्ट्रांग ब्वाय था न , वो दुधु पीता था , दही खाता था और बटर भी खाता था ।

इसलिए उसनें ट्री को टच किया तो ट्री टूट गया ।

फ़िर उसकी मम्मी नें उसकी रस्सी खोल दी और बडे वाला हग किया और पाली भी की ।

शुक्रवार, 18 जून 2010

बेबी डागी का होम-वर्क

. हेल्लो फ़्रैण्ड्स ,
कैसे हैं आप सब ? मेरे स्कूल में तो छुट्टियां चल रही हैं और मैने खूब मस्ती भी की है पूरा एक महीना । अब घूम-घाम कर वापिस आया तो मम्मी नें हाथ में नोट-बुक्स थमा दी , दो दिन से मेरा बिल्कुल भी काम में मन नहीं लगा और मैने काम न करने के खूब बहाने पे बहाने भी बनाए । मम्मी को कब तक टालता , उन्हें भी मेरी कमजोरी पता है न कि मुझे स्टोरी सुनना बेहद पसंद है , बस मम्मी नें मुझे स्टोरी न सुनाकर मेरे डागी को सुनाई जिसे मैनें चुपके से सुना और एक ही दिन में पूरा होम-वर्क फ़िनिश कर दिया । आपको भी सुनाऊं वो स्टोरी जो मम्मी नें डागी को सुनाई........

एक डागी था , उसका छोटा सा एक बेबी था । सब उसे बेबी डागी बोलते । उसकी मम्मी उसे बहुत प्यार करती । बेबी डागी भी मम्मी से बहुत प्यार करता । मम्मी की हर बात मानता पर


छोटा सा गंदा

बच्चा भी था , क्योंकि वह होम-वर्क नहीं करता था । उसकी मम्मी उसको बहुत सारी घुमी-घुमी करवा कर लाती , बहुत सारे ट्वायस लेकर देती लेकिन बेबी डागी को जब होम-वर्क के लिए बोलती तो कोई न कोई बहाने बनाने लगता । फ़िर उसकी मम्मी को बहुत गुस्सा आया और बेबी डागी से बोलना बंद कर दिया । अब बेबी डगी से कोई बात ही नहीं करत था । वो मम्मी को बोलता मम्मी भूख लगी है तो मम्मी चुपचाप खाना दे देती और कहती...अपने आप खा लो । बेबी डागी को मम्मी के बगैर खाना बिल्कुल
अच्छा नहीं लगता था । उसे मम्मी के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था लेकिन अब मम्मी तो बात ही नहीं करती थी , फ़िर वह किसके साथ खेले । फ़िर मम्मी को बोलता...मम्मी मम्मी मुझे बाहर घूमने जाना है । तो मम्मी बोलती अकेले चले जाओ । फ़िर ऐसे रात हो गई । बेबी डागी को सोते समय मम्मी का पीठ पर प्यार से हाथ फ़ेरने से बहुत मजा आता था और स्टोरी सुने बिना तो उसे निनी ही नहीं आती थी पर उसकी मम्मी तो चुपचाप दूसरी तरफ़ मुंह करके सो गई । बेबी डागी को निनी(नींद ) ही नहीं आई , वो कैसे सोएगा । बेबी डागी बहुत उदास हो गया । उसने मम्मी को बुलाया ,पर मम्मी नें कहा - जब तक होम-वर्क फ़िनिश नहीं होगा मुझसे बात मत करना । तो फ़िर मम्मी तो सो गई और बेबी डागी उठ कर होम-वर्क करने लगा । उसनें सारा होम-वर्क जलदी से फ़िनिश कर दिया और फ़िर मम्मी को जाकर जगाया ।

मम्मी मम्मी उठो ।

मैं नहीं उठूंगी , आप होम-वर नहीं करते हो इसलिए बात भी नहीं करुंगी ।

मम्मी मेरी बात तो सुनो ।

मुझे कुछ नहीं सुनना है ।

मम्मी एक बार देखो तो सही , यह क्या है , और बेबी डागी नें अपनी नोट-बुक मम्मी के सामने कर दी ।

मम्मी नें देखा...अरे ये तो सारा होम-वर्क कर लिया आपने । कब किया ?

जब आप सोई-सोई कर रही थीं ।

अब मम्मी नें बेबी डागी को बहुत सारा प्यार किया । उसे खाना खिलाया ,लम्बे वाली स्टोरी सुनाई और फ़िर प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फ़ेरने लगी तो बेबी डागी मिट्ठी-मिट्ठी निनी सो गया । अगले दिन मम्मी नें उसे ढेर सारी चिज्जी लेकर दी ।


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पता है मम्मी नें जब यह कहानी मेरे डागी को सुनाई तो मैं भी पास ही बैठा था और मैनें मम्मी से सारी बोला और मम्मी को होम-वर्क करवाने को कहा । मम्मी नें भी मुझे झट से होम-वर्क करवा दिया , फ़िर हमनें खूब मस्ती की ।
टेम्प्लेट परिकल्पना एवँ अनुकूलन :डा.अमर कुमार 2009